...
"थक गया..
सुनते-सुनते..
शायरी के भारी लफ्ज़..
क्या दे पायेंगे..
ये मुरव्वत.
दो वक़्त की रोटी..
खैरात में..
लंगर भी..
होता बस..
एक बार है..!!"
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Monday, August 27, 2012
Sunday, August 12, 2012
आप दूसरे खेलों की तरफ ध्यान ही नहीं लगायेंगे तो कहाँ से उनका उद्धार होगा..?? मेरा विचार है कि क्रिकेट को ही अपना राष्ट्रीय खेल बना लेना चाहिए..कम से कम राष्ट्र सम्मान तो सुरक्षित रहेगा..!!!
यहाँ दूसरे खेलों को जिस निर्ममता से अग्निकुंड में भस्म किया जाता है, उन सब की कोई होड़ नहीं..!!! क्यूँ ऐसा वातावरण नहीं बनाया जाता जहाँ पर हर खेल को प्रोत्साहित किया जाए, ज़रूरतमंद खिलाड़ियों को सुविधाएं दीं जाएँ..??
सरकार पहले अपनी गद्दी तो जमा लें, मन भर के धन बटोर ले..फिर सोचेगी अगले चुनाव में कैसे वापस आया जाए..?? कब बदलाव आएगा..?? कब विचार-शैली बदलेगी..?? कब हम राष्ट्र-हित में सोचेंगे और कदम आगे बदयेंगे..?? कब उन्नति का बीज हमारे दिमाग में उगेगा, जिससे देश की आर्थिक-स्थिति और मज़बूत हो..???
आखिर कब होगा ये सब..??? कभी होगा भी या नहीं.???
यहाँ दूसरे खेलों को जिस निर्ममता से अग्निकुंड में भस्म किया जाता है, उन सब की कोई होड़ नहीं..!!! क्यूँ ऐसा वातावरण नहीं बनाया जाता जहाँ पर हर खेल को प्रोत्साहित किया जाए, ज़रूरतमंद खिलाड़ियों को सुविधाएं दीं जाएँ..??
सरकार पहले अपनी गद्दी तो जमा लें, मन भर के धन बटोर ले..फिर सोचेगी अगले चुनाव में कैसे वापस आया जाए..?? कब बदलाव आएगा..?? कब विचार-शैली बदलेगी..?? कब हम राष्ट्र-हित में सोचेंगे और कदम आगे बदयेंगे..?? कब उन्नति का बीज हमारे दिमाग में उगेगा, जिससे देश की आर्थिक-स्थिति और मज़बूत हो..???
आखिर कब होगा ये सब..??? कभी होगा भी या नहीं.???
Thursday, June 21, 2012
Thursday, December 29, 2011
Wednesday, December 28, 2011
Thursday, December 22, 2011
Friday, October 14, 2011
'चलो.. तर्पण करें..'
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"बिछा लहू की दीवारें..
समेट सामंतवाद के औज़ार..
लूटा भ्रष्टाचार के कतारें..
जला अंधविश्वास के गलियारे..
चलो..
निर्माण करेंगे..
एक सुरमई धरती का..
एक विशाल इतिहास का..
जीवन के हर उल्लास का..
चलो..
तर्पण करें..
'अहम्' को..
सर्वेश हो..
मातृभूमि फिर..
चलो..
स्वरुप करें जीवंत..
लिखें नयी लेखनी..
हो मानवता का सम्मान..
स्वच्छ मानसिकता..
चलो..
बढे चलो..
भारत-माँ की सुनो पुकार..
करो..
शत्रुओं का संहार..!!!"
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"बिछा लहू की दीवारें..
समेट सामंतवाद के औज़ार..
लूटा भ्रष्टाचार के कतारें..
जला अंधविश्वास के गलियारे..
चलो..
निर्माण करेंगे..
एक सुरमई धरती का..
एक विशाल इतिहास का..
जीवन के हर उल्लास का..
चलो..
तर्पण करें..
'अहम्' को..
सर्वेश हो..
मातृभूमि फिर..
चलो..
स्वरुप करें जीवंत..
लिखें नयी लेखनी..
हो मानवता का सम्मान..
स्वच्छ मानसिकता..
चलो..
बढे चलो..
भारत-माँ की सुनो पुकार..
करो..
शत्रुओं का संहार..!!!"
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Sunday, September 11, 2011
'सियासी भ्रष्टाचार..'
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"बंद करो..
झूठ का व्यापार..
बहुत हुआ..
शोषण और अत्याचार..
नहीं सहेंगे..
हर ओर फैला..
सियासी भ्रष्टाचार..!!!"
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"बंद करो..
झूठ का व्यापार..
बहुत हुआ..
शोषण और अत्याचार..
नहीं सहेंगे..
हर ओर फैला..
सियासी भ्रष्टाचार..!!!"
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Wednesday, August 24, 2011
'सियासी फ़रियाद..'
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"उम्मीदों के साँचें..
भूल अपनी बिसात..
लौट आये कूचे..
कर सियासी फ़रियाद..!!"
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"उम्मीदों के साँचें..
भूल अपनी बिसात..
लौट आये कूचे..
कर सियासी फ़रियाद..!!"
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Wednesday, July 13, 2011
Thursday, June 16, 2011
'समय का प्रवाह..'

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"मंजिलों को पंख लगा..
देश की वायु को जंग लगा..
करती है सरकार..
ना जाने कैसा व्यापार..
भरती अनाज के गोदाम..
मरती जनता बे-दाम..
उठो..
जागो..
समय का प्रवाह करता..
इशारा..
थामो अधिकारों का पिटारा..
गिराओ छल कपट का गलियारा..!!!"
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Tuesday, June 14, 2011
'बेख़ौफ़ शैतां..'

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"इल्म ना हुआ..
शहादत-ए-फ़ौजी..
बेख़ौफ़ शैतां..
रूह में बसर..
सियासी-*बुलहवास..
फ़क़त..
दास्तां ये पुरानी..!!!"
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* बुलहवास = लालची..
Saturday, March 26, 2011
'मनोदशा का खेल..'

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पैसा, भावना और शब्द..यह सब क्या किसी व्यक्ति के स्वभाव को बदल सकते हैं..?? जिसके अंतर्मन की जैसी स्थिति है..वो वैसे ही रहेगी..बस तरीका बदलता है..!!
अंबानी जी स्वयं पैसा कमा रहे हैं..खर्च कर रहे हैं..तो जनता क्यूँ व्यथित हो रही है..?? चाहे वो गगनचुम्बी ईमारत में रहें या अपनी श्रीमती जी को हवाईजाहज भेंट करें..क्यूँ यहाँ सबके माथे पर बल आ जाते हैं..?? उनकी संपत्ति..उनका नजरिया..जैसे चाहें उपयोग करें..!!
जिसे देखो दूसरों की ख़ुशी से बिफर जाते हैं..अब श्रीमान वारेन बुफ्फेट को ही लीजिये..!!! भारत में बढ़ते अरबपतियों की चिंता उन्हें सता रही है..इसीलिए यहाँ यात्रा पर आयें हैं और सबको कह रहे हैं--'कृपया अपनी संपत्ति में से दान करिए..!!'...
जिसकी जैसी इच्छा..वो चाहें दान करें..उपभोग करें..किसी को क्यूँ परेशानी होती है..!!! और भारत जैसे देश में आकर यह कहना कितना उचित है..जहाँ सम्राट अशोक ने सर्वस्व त्याग दिया था..!!!! त्याग की प्रवृति तो हमारे लहू में है..!!!
क्या हम कभी अपने नेतागण से कहते हैं--'आपने बहुत धन कमा लिया..आप के पास इतनी चल-अचल संपत्ति है..अब दान कीजिये..!!! आप अब विदेश भ्रमण पर ना जाएँ..कहाँ-कहाँ धन एकत्रित किया है, रोकड़ का हिसाब दें..अपने क्षेत्र का कितना विकास किया, उसका ब्यौरा दें...!!!'
सब हमारी मनोदशा का खेल है..!!! क्यूँ हम प्रसन्न नहीं रह सकते, अगर किसी के पास ज्यादा धन है..समृद्धि है..????
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Monday, March 21, 2011
'राष्ट्रीय खेल इस 'अद्भुत खेल' की भेंट चढ़ जाएगा..'

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सबसे पहले आप राजनीति में समय की सीमा तय करवा दीजिये..उसके बाद सब कुछ लय में अपने आप आ जाएगा..!! इस सत्ता का मोह ऐसा है कि हर क्षेत्र में इसका(राजनीति में प्रयोगिग अनुसंधानिक नीतियाँ) बोलबाला है..!!!
खेल के क्षेत्र में..शिक्षा के क्षेत्र में..रोज़गार के क्षेत्र में जाइए..या फिर भोजन के सन्दर्भ में..सारी दिशाएँ इस प्रलोभन के चंगुल में फँस गए हैं..!!! जो भी एक बार यहाँ आ गया, वो बाहर जाना ही नहीं चाहता..!! 'कुर्सी' का मोह ऐसा है कि --'जान जाए पर कुर्सी ना जाए..' !!!
कैसा विलासतापूर्ण अध्याय है..जहाँ हम सब देश का विकास चाहते हैं..पर अपने हिस्से का बलिदान नहीं कर सकते..!!! कैसी विडम्बना है..!!! कैसा विधि का कालचक्र घूम रहा है..हम सब लोभ और असहिष्णुता के दलदल में इतने डूब गए हैं, कि स्वयं ही नहीं उबार पा रहे..बाकी संसार/देश के बारे में विचार कहाँ से आयें..????
कितनी योजनायें बनती हैं..कितनी ही समितियां बनायीं जातीं हैं..विचार-मंथन के लिये..!! कितना ही मनुष्य-धन लगाया जाता है..निष्कर्ष भी निकालता है..पर फिर वही 'राग' लक्ष्य से हमारा ध्यान विचलित कर देता है..!!!
खेल क्षेत्र में असीम संभावनाएं हैं..धन भी आवंटित होता है..परन्तु अपने गंतव्य स्थान तक कोई पहुंचता ही नहीं है..!!!! बीच डगर में ही सब समाप्त हो जाता है..!!! हमारे माननीय सत्ताधारी प्रजाति के जन मोहपाश से निकल नहीं पाते..और यह सब अज्ञानतावश हो जाता है..!!!
कुछ समय पश्चात हमारा राष्ट्रीय खेल इस 'अद्भुत खेल' की भेंट चढ़ जाएगा..और स्मृतियाँ ही शेष रहेंगीं..!!!
अब विचार करने और नीतियाँ बनाने का समय नहीं रहा..करने का समय है..!! अन्यथा कुछ शेष नहीं रहेगा..!!!
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Sunday, March 6, 2011
'किसी को कोई फरक नहीं पड़ता..'

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किसी को कोई फरक नहीं पड़ता..सब ही भ्रष्ट हैं..हसन अली जी हों या सुरेश कलमाड़ी जी..थोमस जी या बेचारे खुद मनमोहन जी..सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे..!!! इन सब बातों पर अपनी ऊर्जा का प्रवाह करने से कोई लाभ नहीं..!!
आप क्या कर सकते हैं..?? सरकार हटा सकते हैं..?? महंगाई घटा सकते हैं..?? आम आदमी को रोटी दिला सकते हैं..?? निर्दोष व्यक्ति को न्याय दिला सकते हैं..?? खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को व्यवस्थित जगह निवेश कर सकते हैं..??? आम जनता को सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं..?? रोज़गार उपलब्ध करा सकते हैं..??? शिक्षा का समुचित विकास करा सकते हैं..?? शिक्षण संस्थानों का दुरूपयोग रोक सकते हैं..??? 'कर' को दूसरे देशों में जाने से रोक सकते हैं..?? एक ऐसा संगठन बना सकते हैं, जहाँ शुद्ध स्वरुप में देश के विकास के लिए नीतियाँ बन सकें..??
जाने दीजिये..!! यहाँ दिखता कुछ और है..होता कुछ और है..जो आवाज़ उठता है..वो ही मारा जाता है..!!! सब छलावा है..भ्रम है..!! सब यहाँ स्वार्थ के लिए ही जीते हैं..! जो सत्य की दुशाला पहनेगा, उसे ही व्यर्थ जीवन गँवाना पड़ेगा..!!
यहाँ बैठ कर लिखना और इस गंभीर विषय पर लिखना सरल है, परन्तु उसे निभाना और जीना उतना ही कठिन..!!!
प्रयत्न बहुत करते हैं..सफल हो जाएँ..तब समझें, 'जीवन सफल हुआ..ध्येय पूरा हुआ..!!!'
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"आशा की किरण लिए चलता हूँ..
ह्रदय में ज्योत लिये जलता हूँ..
निश्चय ही मिलेगी जीत की मिठाई..
लहू के धनुष..फौलाद के विचार मलता हूँ..!!"
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जय हिंद..!!!!
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