Tuesday, September 25, 2012

'सरकार का दायित्व..'

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यहाँ सरकार का दायित्व क्या है..??

क्या उन्हें चिंता है कि -- कितने गाँवों में पेयजल की व्यवस्था आज भी सुचारू रूप से नहीं हो पायी है; कितने ही होनहार बच्चे व युवा शिक्षा से वंचित हैं; कितने ही किसान ऋण में डूब रहे हैं; कितने ही घरों में आज तक पर्याप्त बिजली नहीं है/शौचालय नहीं है; कितने ही बच्चे, वृद्ध, रोगी सस्ती दवाई के लिए तड़प रहे हैं; कितने ही वृद्ध pension के लिए दर-दर भटक रहे हैं; कितने ही सैनिक सीमा पर दिन-रात अपनी जान दाँव पर लगा रहे हैं; कितने ही गोदाम धान से सड़ रहे हैं; कितने ही जल-कूप सूख रहे हैं; कितनी ही सड़कें टूटी-फूटी हैं और हर दिन कितनों की जीवन-लीला समाप्त कर देतीं हैं; कितने ही गाँव स्वास्थ्यालय/अस्पताल को जीवनभर देख भी नहीं पाते हैं; कितने ही लोग जीवनयापन के लिए मेहनत करते हैं और अपनी कमाई की आधी से ज्यादा राशि 'हफ्ता-वसूली' के नाम पर 'कुछ लोगों' को दे देते हैं; कितने ही लोग एक्सिडेंट में घायल हो अस्पताल पहुँचते हैं सिर्फ ये सुनने के लिए कि 'ये तो police case है, पहले पोलिसे को आने दीजिये', फिर चाहे वो अपनी अंतिम साँसें ही तोड़ दे; कितने ही मासूम जन बम-धमाके में मर जाते हैं और कोई उन आतंकवादियों को कभी पकड़ ही नहीं पाता है, कितने ही बच्चे अनाथ हो जाते हैं और स्त्रियाँ विधवा; कितने ही कागज़ी खेल खेले जाते हैं, हर साल नयी नीतियाँ बनतीं हैं और हर साल नए घपले किये जाते हैं; कितनी ही नदियाँ मैली हो गयीं, सूख गयीं पर कोई उन पर ध्यान ही नहीं केन्द्रित कर पाटा है; कितने ही अरबों रुपैये की रियायत मंत्रियों को दी जाती है(घर, रसोई गैस, बिजली, पानी, फ़ोन, दवाई, हवाई-यात्रा, होटल-व्यवस्था, इत्यादि); कितने ही योग्य छात्र देश में रह सेवा नहीं कर सकते क्यूँकि किसी कारणवश वो योग्य नहीं; कितने ही सैनिक अपना दम तोड़ देते हैं मंत्रियों/गणमान्य लोगों को बचाने के लिए(आखिर उनकी सुरक्षा से बढ़कर कुछ भी नहीं, अगर उन्हें कुछ हुआ तो देश कौन चलाएगा, देश की बागडोर किसके हाथ में जायेगी)....

कितने ही अनगिनत प्रश्न हैं जिनका उत्तर मिलता नहीं, या यूँ कहिये कोई देना चाहता नहीं..बस, पैसा आ गया; बैंक भर गया; जेवर आ गए; चल-अचल संपत्ति आ गयी; जीवन भर की जुगाड़ हो गयी; अब काहे का देश, काहे की जनता..आज तो हम सत्ता में हैं, कल की कल सोचेंगे; आज तो जी भर के लूट लें, जीवन जी लें...कल अगर फिर से आ ना सकें यहाँ तो..???

दुर्भाग्य है हमारा, ऐसी भावना लिए लोग शीर्ष पर आसीन हैं और हम उनके सेवक हैं..जबकि होना इसका उलट चाहिए..!!!

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